September 24, 2021

भारत मां तेरे देश में नारी की ये दशा…?

भारत मां तेरे देश में नारी की ये दशा…?

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्तु रमन्ते तत्र देवता:”

कहा जाता है जहां नारियों की पूजा होती है, वहीं देवता निवास करते हैं.

ये उसी वैदिक ग्रंथ का श्लोक है जिस पर हमारी भारतीय संस्कृति आश्रित है, जिस पर हमारी संस्कृति भली-फूली और आगे बढ़ी है.

जहां सदियों से ही नारियों को देवी का दर्जा दिया गया है, उन्हें पूजा गया है और इतिहास गवाह है कि जब-जब आवश्यकता पड़ी है, समाज व राष्ट्र के उत्थान के लिए नारियों ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया है व देश के विकास में अपना एक अहम योगदान दिया है.

अगर देखा जाए तो हर युग में, हर सदी में नारियों ने समाज के विकास में मुख्य भूमिका निभाई है. कोई भी धर्म हो, कोई भी संप्रदाय हो सब में नारी का स्थान सबसे ऊंचा माना गया है. किसी में नारी को जननी जन्मदात्री तो किसी में देवी का रूप माना गया है. किसी में मातृशक्ति तो किसी में नारायणी माना गया है. वास्तव में वो नारी ही है जिससे हमसब हैं, यह समाज है, यह दुनिया है.

लेकिन, इतना विशिष्ट स्थान होने के बावजूद भी वर्तमान में नारियों की ऐसी स्थिति ऐसी दुर्दशा देश के लोकतंत्र पर बड़ा प्रश्न खड़ा करती है. ऐसी स्थिति देख, मन क्षुब्ध हो जाता है, हृदय द्रवित हो उठता है.

लोकतंत्र पर ये प्रश्न मैं नहीं खड़ा कर रहा. प्रश्न खड़ा कर रहीं हैं- 16 दिसंबर 2012 दिल्ली की सबसे भयावह व दंग कर देने वाली निर्भया गैंगरेप हत्याकांड, 17 जनवरी 2018 मात्र 8 साल की मासूम आसिफा की  कठुआ गैंगरेप हत्याकांड, 2 जून 2019 अलीगढ़ की महज ढ़ाई साल की मासूम ट्विंकल की दर्दनाक हत्या, 24 मई 2019 मुजफ्फरनगर की 14 साल की दलित बच्ची की गैंगरेप हत्याकांड और अभी हाल ही के दिनों में सनसनीखेज व चर्चा का विषय बनी हुई एक और चकित कर देने वाली घटना ” उन्नाव रेप केस ” जो कि 4 जून 2017 में हुई घटित हुई और 8 अप्रैल 2018 में मीडिया में तब आई जब उस 17 वर्षीय पीड़िता ने आरोपी विधायक कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ एफआईआर की मांग करते हुए प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सरकारी आवास के बाहर आत्मदाह करने की कोशिश की.

अगर इस पूरी घटना को आप देखें तो आपको लगेगा कि ये किसी थ्रीलर फिल्म की कहीनी है. और ये मुख्यतः जितनी भी चर्चित घटनायें हमारे समाज में हुई हैं किसी फिल्म की काल्पनिक कहानी की तरह ही हैं पर सच हैं. यहां तक कि कुछ पर फिल्म भी बन चुंकी हैं.

ये कुछ मुख्य घटनाएं हैं जो मीडिया  के जरिये देश के सामने आईं हैं। ऐसी ही न जाने कितनी सैकड़ों घटनाएं हैं जिनपर किसी की नजर ही नहीं पड़ी, और पड़ी भी तो वो दफ्तर के किसी कोने में फाइलों में ही दबकर रह गईं या आज की राजनीति का शिकार होकर दफ़न हो गयीं.

यह सोचने वाली बात है कि आज हमारा लोकतंत्र राजतंत्र का गुलाम है. क्योंकि इसमें कहीं न कहीं सरकार व प्रशासन भी जिम्मेदार है.

आपको हैरानी होगी जानकर कि नेशनल क्राइम ब्यूरो रिकार्ड्स के मुताबिक हिन्दुस्तान में हर 20 मि. में एक लड़की का रेप होता है.

बता दूं कि बीते महज 6 महीनों में, यानी 1 जनवरी 2019 से 30 जून 2019 के बीच हमारे देश में बच्चियों के साथ दुस्कर्म के 24,212 मामले दर्ज हुए हैं. यानी 1 महीने में 4000 मामले, 1 दिन में 130 मामले और हर 5 मिनट में 1 बलात्कार की घटना दर्ज होती है.
और वो भी तब, जब इस समस्या को हल करने के लिए 2012 में बने पोक्सो (प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेन्स ) एक्ट जैसी कई मुख्य योजनाएं कार्य कर रही हैं.

इतने कम समय में ही नारियों के साथ इतने मामले, इतने दुस्कर्म व हत्यायें, हमारे देश के विकास में बहुत बड़ी बाधक हैं और यह आने वाली पीढ़ी के लिए बहुत बड़ी चुनौतीपूर्ण समस्या है.

दिन-प्रतिदिन समाज में हो रहीं ऐसी शर्मसार कर देने वाली घटनाएं सोचने पर विवश कर देती हैं. आश्चर्य होता है लोगों की ऐसी सोच ऐसी मानसिकता पर कि आखिर इंसान होकर भी वह इतना गिर कैसे सकता है? जिसने उसको नौ महीने कोख में रखा जन्म दिया, पाल-पोषकर इतना बड़ा किया. उसी का सम्मान कैसे लूट सकता है, उसी की इज्जत के साथ कैसे खेल सकता है?

ऐसे कुकर्म करने वालों को सिर्फ फांसी दो फांसी दो चिल्ला देने से, दो-चार मोमबत्ती जला देने से इसका हल नहीं निकलने वाला. यह एक बहुत ही संवेदनशील और विचारणीय विषय है, जिसपर सभी को गहराई से चिंतन-मनन और विश्लेषण करने की आवश्यकता है. आवश्यकता है इसके मुख्य कारण को समझने और उस पर सकारात्मक पहल करने की. आवश्यकता है आज इस संगीन मुद्दे पर बहस करने की बजाय सभी को मिलकर इसका हल निकालने की.

जहां तक मैं समझता हूं इसका एक ही समाधान हो सकता है कि आने वाली नई पीढ़ी को शिक्षा-विद्या के सम्यक ज्ञान में पिरोया जाये. उनमें संस्कारों का बीजारोपड़ कर सही राह दिखाया जाए.
साथ ही इसके लिए प्रशासन व सरकार को भी सख्त कदम उठाने चाहिए क्योंकि ऐसे अपराध करने वालों के खिलाफ इतनी सख्त सजा (फांसी) होने के बावजूद भी उन्हें फांसी नहीं होती है और राजतंत्र की बदौलत एक दिन वो छूट कर बाहर घूमते नजर आते हैं. इसे सरकार व प्रशासन की लापरवाही ही कहा जा सकता है. काफी हद तक ये लोग भी जिम्मेदार हैं.

क्योंकि जहां नारियों का सम्मान नहीं है, वह राष्ट्र कितना भी आधुनिक रूप से समर्थ हो जाये, पूर्णरूप से विकास नहीं कर सकता, आगे नहीं बढ़ सकता.
जहां नारियों का सम्मान है, वहीं संस्कृति का  उत्थान है और राष्ट्र का कल्याण है.

धन्यवाद….

लेखकः पत्रकार, कवि व लेखक दुर्गेश बहादुर प्रजापति