September 24, 2021

सीएए पर बवाल ; क्या है असली वजह ?


सीएए पर बवाल ; क्या है असली वजह

सी. ए. ए. अर्थात नागरिकता संशोधन विधेयक जो पिछले 11 दिसंबर को भारतीय संसद के दोनों सदनों में भारी बहुमत से पास कर दिया गया है और अब संविधान का एक अंग है l इसे स्वीकर करना इस देश के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य भी है और देश की आवश्यकता भीl अब कहने की बात यह है कि क्यों भारत के कुछ लोगों के द्वारा जो पढ़े लिखे हैं, इस संशोधन का विरोध किया जा रहा है l इस सम्बंध में कुछ कहने से पहले कुछ बातें समझ लेने जैसी हैं l विरोध के लिए जिन दो या तीन मुद्दों को आधार बनाकर प्रदर्शन और प्रदर्शन के नाम पर राजनीति चमकाने की कोशिश की जा रही है वो इस प्रकार हैं –

ये कि नागरिकता संशोधन विधेयक संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन हैl
ये कि इस संशोधन से देश की जनसंख्या बढ़ेगी और संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा l
ये कि इस संशोधन से देश के उन राज्यों में जहाँ ऐसे लोगों की संख्या बहुतायत में है जो वहाँ के मूल निवासी न होकर बंग्लादेश या किसी अन्य सीमावर्ती देशों से शरणार्थी हैं और शरणार्थी वीजे पर रहते हैं, उनको वहाँ की नागरिकता मिल जाएगी और असम जैसे राज्यों में असमिया बोलने वाले मूल निवासी अपने ही राज्य में अल्प संख्यक हो जाएंगेl
ये कि इस संशोधन से केवल हिन्दुओ को ही नागरिकता मिलेगी मुसलमानों को नहींl
तथा सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे बड़ा मुद्दा ये कि सी. ए. बी. वास्तव में एन. आर.सी. की तैयारी है जिससे एन आर सी से बाहर होने वालों हिन्दुओं को तो नागरिकता मिल जायगी लेकिन मुस्लमान बाहर l

आइए समझते हैंl
नागरिकता संशोधन विधेयक अर्थात सी. ए. बी. के विरुद्ध जो पहला आरोप लगाया जा रहा है तथा अनेक राजनीतिक पार्टियाँ इस बिल का विरोध करने में जुटी हैं वो यह कि इस संशोधन के लागू होने से संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन होगा l ओवैसी से ले कर अधीर रंजन तक ना जाने कितने नेता इसी बात को लेकर छाती पीट रहे हैं कि यह मुसलमानो के साथ भेद भाव हैl गौरतलब है कि उक्त अनुच्छेद 14 भारत के सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है धर्म, जाति, लिंग वंश, निवास स्थान आदि के आधार पर किए जाने वाले भेद-भाव का निषेध करता है l अब मुद्दे की बात ये कि उक्त संशोधन विधेयक के अन्तर्गत उन लोगों को भारत की नागरिकता दी जा रही है जो धर्म के आधार पर दूसरे देशों से प्रताड़ित, निष्कासित हैं और भारत में शरणार्थी हैंl अब इस प्रकार के शरणागत केवल हिन्दू, पारसी या बौद्ध ही नहीं हैं बल्कि भारी संख्या में मुस्लमान भी हैं जो बंगाल और असम आदि राज्यों में रह रहे हैंl यद्यपि उनके पलायन का आधार धार्मिक उत्पीड़न नहीं है फिर भी वह शरणार्थी हैंl विपक्ष यह बताने का प्रयास कर रहा है कि ये तो उन शरणार्थी मुसलमानों के साथ धर्म के आधार पर भेद भाव हो गया और चिल्ला चिल्ला कर इसे अनुच्छेद 14 का उल्लंघन कह रहा है l तो ये बताइए जो भारत के नागरिक ही नहीं है उसके लिए अनुच्छेद 14 का क्या मतलबl कुल मिलाकर विरोध का यह आधार संवैधानिक नहीं है और यह मामला कोर्ट में भी नहीं टिकने वाला l इस मुद्दे पर होने वाला विरोध भी केवल राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए लगायी गयी आग ही है l

दूसरा मुद्दा है जनसंख्या वृद्धि का तो इस संशोधन से जो अतिरिक्त जनसंख्या आने वाली है वह तो पहले से ही भारत में है और हमारे संसाधनों का उपयोग भी कर रहे हैं l अब जो वर्षों से यहाँ रह रहे हैं उनके ऑन रिकार्ड नागरिक होने से कोई ज्यादा फर्क़ नहीं पड़ने वाला और विरोध का यह मुद्दा भी केवल विरोध का एक बहाना मात्र ही है जो एक ही झटके के लिए आया था और अब चाला ही गया है साथ ही इसका कोई तार्किक आधार नहीं है तो आम आदमी के रुचि का विषय भी नहीं है l

तीसरा और बड़ा मुद्दा जिसके आधार पर मुसलमानों को बरगला कर सड़कों पर उतारा जा रहा है और आग लगाकर 47 जैसी स्थिति पैदा करने की कोशिश की जा रही है वह है हिन्दू मुस्लमान के बीच सीधे टकराव पैदा करने वाला तर्क की इस बिल से केवल हिन्दू शरणार्थियों को ही लाभ दिया जा रहा है l एक बात तो सही है कि इस संशोधन का मूल आधार ही धर्म है तथा इसमें उन्हीं हिन्दुओं, सिक्खों, पारसियों, बौद्धों आदि को राहत दी गई है जिनके साथ पड़ोसी इस्लामिक देशों में धर्म के आधार पर प्रताड़ना हुई है l सरकार का तर्क है कि चूंकि इस्लामिक देशों में प्रताड़ना केवल गैर मुस्लिम नागरिकों के साथ ही हुआ है और ज्यादातर देशों में उनके पास इसके उपचार का कोई प्रावधान भी नहीं है अतः मान्यता के आधार पर एक धर्म निरपेक्ष और हिन्दू बाहुल्य राष्ट्र होने के कारण हमें उनको शरण देना चाहिए और इसी लिए यह संशोधन किया गया है जिससे ऐसे गैर मुस्लिम शरणार्थियों को यहाँ की नागरिकता दी जा सके l लेकिन मजे की बात ये कि देश के ऐसे राजनीतिक दल जो मुस्लिम ध्रुवीकरण को ही अपनी राजनीति का आधार मानते आए हैं, आज भी उसी को आधार बनाकर अपनी राजनीति चमकाना चाहते हैं और इसलिए शहर-शहर आग लगवा कर, आम जनता को परेशान करने, वर्तमान सरकार के विरुद्ध ध्रुवीकृत करने का प्रयास कर रहे हैं l
चौथा मुद्दा जिसमें क्षेत्रीय अस्मिता का हवाला देते हुए अहिंसा भड़कायी जा रही है l असल मे असम सहित पूर्वोत्तर के कई ऐसे राज्य हैं जो आदिवासी संस्कृति और संस्कारों के कारण विशेषाधिकार प्राप्त हैं तथा जिन्हें ILP (Inner Line Permit) का उपबंध प्राप्त हैl ILP के अंतर्गत असम के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों के साथ साथ त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड आदि राज्यों को कुछ ऐसे अधिकार प्राप्त हैं जिनके कारण देश के अन्य हिस्सों के निवासी यहाँ भूमि नहीं खरीद सकते हैं, नौकरी नहीं कर सकते हैं आदि आदि l उक्त नागरिक संशोधन विधेयक में ILP के राज्यों को इससे अलग रखा गया है l इस प्रकार क्षेत्रीय, भाषायी और संस्कृतिक अस्मिता के नाम पर किया जाने वाला बवाल भी निराधार ही है l तो प्रश्न यह उठता है कि ‘आसू’ (All Asam Students Union) क्यों छाती पीट रही है l तो असली मुद्दा हम बताते हैं आपको l

अंतिम मुद्दा ये है कि इस बिल की आड़ में NRC के लिए पृष्टभूमि बनाई गई है l यह आरोप सही भी हो सकता है और नहीं भी l यह तो तय है कि केंद्र सरकार का अगला कदम NRC ही है असम में तो इसकी अंतिम लिस्ट भी आ चुकी है, (यह बात और है कि अभी भी प्रक्रियाएँ चल रही हैं और जिन लोगों के नाम छूट गए हैं उनको अपने दस्तावेज जमा कर नाम जुड़वाने का काम भी चल रहा है बशर्ते उनके पास 12 वर्षों से यहाँ निवास का प्रमाणपत्र हो) असम NRC की इस अंतिम लिस्ट से 19 लाख 6 हजार 657 लोग बाहर हैं, लिस्ट का आधार 1971 के पूर्व से असम में रह रहे लोगों को ही बनाया गया l इस आधार के पीछे भी एक बड़ा रामायण है l 1980 के आसपास असम में अवैध विदेशी लोगों की बढ़ती गतिविधियों के बाद एनआरसी को अपडेट करने की मांग तेज हुई l इसमें सबसे बुलंद आवाज थी असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसु) की l खूब हो हल्ला हुआ जम के बवाल काटा गया और अंततः ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन और असम गण परिषद की तरफ से एनआरसी के नवनीकरण की मांग को लेकर 1980 में केंद्र को एक ज्ञापन सौंपा गया। बांग्लादेश से असम आ रहे अवैध अप्रवासियों से असम की संस्कृति की रक्षा करने के लिए यह ज्ञापन सौंपा गया था। जिसके बाद NRC की प्रक्रिया फिर शुरू हुई 2005 में मनमोहन सिंह की कॉंग्रेस सरकार ने इसे शुरू किया लेकिन 2010 में असम के बारपेटा में हिंसा के बाद इसे रोक दिया गयाl 2015 में यह फिर शुरू हुआ और 31 अगस्त 2019 को अंतिम लिस्ट जारी की गयी l

अब मुद्दे की बात ये है कि इस अंतिम लिस्ट में बाहर होने वाले लोगों में 5 लाख से अधिक हिन्दू हैं तथा गैर मुस्लिम अन्य लोगों को जोड़ कर यह संख्या करीब 6-7 लाख तक हो जाती हैl आसू के विरोध का आधार यही संस्कृतिक अस्मिता है l हालांकि यह एक चोंगा भर है, मुख्य मुद्दा तो यह है कि CAB से 6 लाख गैर मुस्लिमों को नागरिकता मिल जाएगी और मुस्लिम बाहर हो जाएंगे परंतु इसे सीधे तौर पर नहीं कहा जा सकता इसलिए इन लोगों ने संस्कृतिक अस्मिता का मुद्दा बनाया है l आसू के विरोध का एक और आधार CAB में नागरिकता देने की समय सीमा पर भी है l CAB के अनुसार नागरिकता सिद्ध करने की तारीख वर्ष 2014 है जबकि असम समझौते (1985) के अनुसार यह सीमा 1971 हैl अब जो मुद्दा बनाया जा रहा है उसका लब्बोलुआब यह है कि असम के हिन्दू बाहुल्य इलाकों में में बांग्ला बोलने वाले लोगों की संख्या लगभग 50 प्रतिशत है जो गैर असमिया हैं या यूं कहें कि बांग्लादेशी हैं जबकि असमिया बोलने वालों की संख्या लगभग 1 करोड़ से थोड़ा अधिक है जो इनसे कम हैl असम के हिन्दू बाहुल्य इलाके जैसे जोरहाट, शिवसागर, डिब्रूगढ़ और गुवाहाटी आदि में बांग्ला बोलने वाली भारी आबादी यदि नागरिक हो गई तो असमिया भाषी अपने ही घर में अल्पसंख्याक हो जाएंगेl यह एक बड़ा कारण है कि असम के उक्त जिलों में ज्यादा विरोध हुआ है l
देश के अन्य हिस्सों में होने वाले विरोध प्रदर्शनों का मूल आधार केवल वोट बैंक की राजनीति हैl धर्म के नाम पर लोगों को बरगला कर उन्हें यह बताना कि मुसलमानो को देश से निकालने की साजिश हो रही है और यह उस ओर पहला कदम है l यह कुल मिलाकर विपक्ष की हताशा है जिसका प्रदर्शन वह कर रही हैl देश के मुसलमानों को चाहिए कि इसे हवा दे कर अपनी आतंकवादी छवि का परिचय ना देंl जबकि देश के सभी जिम्मेदार लोग यह कह चुके हैं कि जो भारत के नागरिक हैं उनको कोई खतरा नहीं हैl
निष्कर्ष यह है कि सरकार को इसके संबंध में जनसभाएं करनी चाहिएl जागरुकता अभियान चलाना चाहिएl यह बताना चाहिए कि CAB से लाभ मुसलमानो को ही हैl देश में ऐसे मुस्लमान जो अवैध रूप से रह रहे हैं और वर्षों से अल्पसंख्यक बन कर उन्हीं के हिस्से का खा रहे हैं वे कम हो जाएंगे तो लाभ मुस्लमान नागरिकों को ही होगाl लेकिन विडंबना यह है कि उन्हें ना शिक्षा चाहिए, ना विकास, चाहिए तो केवल हूरें और जन्नत जो नसीब होता भी है या नहीं यह तो कोई फिदायीन नया जन्म ले तो बताये l

Writer :- ऋतुध्वज सिंह, असिस्टेंस प्रोफेसर, देव संस्कृति विश्वविद्यालय, हरिद्वार

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