महान क्रांतिकारी मंगल पांडे की 194वीं जयंती पर विशेष: एक अमिट कहानी…

महान क्रांतिकारी मंगल पांडे की 194वीं जयंती पर विशेष: एक अमिट कहानी…

 

मंगल पांडे एक ऐसा नाम, जिसने अंग्रेजों के चंगुल से भारत माँ को आजाद कराने के लिए 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का विगुल फूंका और पहले क्रांतिकारी कहलाए. आज उस महान क्रांति नायक की 194वीं जयंती है.

 

मंगल पाण्डेय का जन्म भारत में उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के नगवा नामक गांव में 19 जुलाई 1827 को एक “ब्राह्मण” परिवार में हुआ था. हांलाकि कुछ इतिहासकार इनका जन्म-स्थान फैज़ाबाद के गांव सुरहुरपुर को मानते हैं. इनके पिता का नाम दिवाकर पांडे था और माता का नाम अभय रानी था. “ब्राह्मण” होने के बाद भी मंगल पाण्डेय सन् 1849 में 22 साल की उम्र में ही ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में शामिल हो गए और ब्रिटिश सेना में रहते हुए उन्होंने 29 मार्च 1857 को अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था, जिसके बाद उन्हें 8 अप्रैल 1857 को फांसी दे दी गई थी और देश का ये लाल हंसते-हंसते इस मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी थी.

 

आज देश के इस महान क्रांतिकारी की जयंती पर उन्हें याद करते हुए और उनसे देश के लिए बलिदान होने की सीख लेते हुए आइये एक नजर डालते हैं उनके जीवन की पृष्ठभूमि पर….और जानते हैं उनके जीवन से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण संस्मरण…

 

मंगल पांडे सन 1849 को ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में भर्ती हुए. उन्हें कलकत्ता के निकट बैरकपुर की सैनिक छावनी में 34वीं बंगाल नेटिव इन्फैंट्री में शामिल किया गया था. वे पैदल सेना के 1446 नंबर के सिपाही थे.

 

अंग्रेज अधिकारियों द्वारा भारतीय सैनिकों पर अत्याचार तो हो ही रहा था, लेकिन हद तब हो गई. जब भारतीय सैनिकों को ऐसी बंदूक दी गईं, जिसमें कारतूस भरने के लिए दांतों से काटकर खोलना पड़ता था. इस नई एनफील्ड बंदूक की नली में बारूद को भरकर कारतूस डालना पड़ता था. वह कारतूस जिसे दांत से काटना होता था, उसके ऊपरी हिस्से पर चर्बी होती थी.

उस समय भारतीय सैनिकों में अफवाह फैली थी कि कारतूस की चर्बी सुअर और गाय के मांस से बनाई गई है. ये बंदूकें 9 फरवरी 1857 को सेना को दी गईं. इस्तेमाल के दौरान जब इसे मुंह लगाने के लिए कहा गया तो मंगल पांडे ने ऐसा करने से मना कर दिया था. उसके बाद अंग्रेज अधिकारी गुस्सा हो गए. फिर 29 मार्च 1857 को उन्हें सेना से निकालने व वर्दी और बंदूक वापस लेने का फरमान सुनाया गया.

 

उसी दौरान एक अंग्रेज अफसर उनकी तरफ बढ़ा, लेकिन मंगल पांडे ने भी उन पर हमला बोल दिया. उन्होंने साथियों से मदद करने को कहा, लेकिन कोई आगे नहीं आया. फिर भी वे डटे रहे और अंग्रेज अफसरों पर गोली चला दी. जब किसी भारतीय सैनिक ने साथ नहीं दिया तो उन्होंने अपने ऊपर भी गोली चलाई लेकिन वे सिर्फ घायल हुए. फिर अंग्रेज सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया. जिसके बाद 6 अप्रैल 1857 को उनका कोर्ट मार्शल किया गया और 8 अप्रैल 1857 को उन्हें फांसी दे दी गई.

 

मंगल पांडे ने पहली बार ‘मारो फिरंगी को’ का नारा देकर भारतीयों का हौसला बढ़ाया था.

 

वहीं उनके याद में भारत सरकार ने 5 अक्टूबर, 1984 को उनके नाम से डाक टिकट जारी किया था.

 

मंगल पांडे की जीवन पर फिल्म भी बन चुकी है. मंगल पाण्डेय-दी रायसिंग स्टार नाम से 2005 में बनी हिंदी फिल्म में बॉलीवुड स्टार आमिर खान ने उनका किरदार निभाया था.

 

देश का यह लाल मात्र 30 साल की उम्र में अपने जीवन को देश के नाम कुर्बान कर दिया था. आने वाली पीढ़ी ऐसे क्रांतिकारी के जीवन से सीख लेकर देश के लिए कुछ अच्छा करने का प्रयास करेगी…ऐसे महान व्यक्तित्व की 194वीं जयंती पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि…

 

 

– The Political Mantra