September 24, 2021

जिनसे हमारा जीवन है

जिनसे हमारा जीवन है…

“एक समय था जब पेड़ों के बीच आदमी रहा करता था और आज एक समय है कि आदमियों के बीच कहीं एक पेड़ रहता है।”
आज जब हम 21वीं सदी के दौर में जी रहे हैं तो उपरोक्त कथन कहीं न कहीं हमारे सामने फलीभूत होता दिखाई पड़ रहा है।

आज जब आधुनिकता मनुष्य के सर चढ़ कर बोल रही है और वह इंसान पर इसकदर हॅावी है कि वह दिन−प्रतिदिन पेड़−पौधों, जंगलों को काटकर प्राकृतिक पर्यावरण को दूषित करता जा रहा है और इतना ही नहीं अब तो वह प्राकृतिक सौंदर्य की गोद पहाड़ों को भी काटकर अपना आशियाना बना रहा है, जिसका परिणाम किसी से छुपा नहीं है। सन् 2001 में आया गुजरात भूकम्प, 2004 में आयी हिन्दमहासागर सुनामी, 2013 में आयी उत्तराखण्ड त्रासदी, 2014 में आया कश्मीर भूकम्प तथा अभी हाल ही में केरल में आयी बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदायें इन्हीं प्राकृतिक पर्यावरण को प्रदूषित करने का ही संकेत है। विश्व संरक्षण एवं अनुमापन केन्द्र कनाडा के अनुसार करीब 22,000 पादप तथा जीव-जन्तु वास्तव में विलुप्त होने के कगार पर पहुँच गए हैं। और इस प्रकार जैव विविधता में कमी का मुख्य कारण मानवीय क्रिया-कलाप, कृत्रिम परिर्वतन एवं पर्यावरणीय विनाश ही है। इसी वजह से विश्व का तापक्रम बढ़ रहा है, जलवायु एवं मौसम में तेजी से परिवर्तन हो रहा है तथा समुद्री सतह ऊपर उठ रहा है। और ऐसी स्थिति संपूर्ण मानव जाति के विनाश का कारण बन सकती है। ऐसी आशंका होने के बावजूद भी इंसान अपने स्वार्थ वश इनका गलत उपयोग कर अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार रहा है।

कुछ मुख्य योजनायें व संगठन इस दिशा में कार्य कर रहीं हैं जैसे ‘पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ भारत सरकार, गायत्री परिवार हरिद्वार, हेस्को (एचईएससीओ) देहरादून, नवधान्या देहरादून, बॉम्बे प्राकृतिक इतिहास सोसाइटी (बीएनएचएस) मुंबई, विज्ञान और पर्यावरण के लिए केंद्र बिन्दु (सीएसई) नई दिल्ली, भारतीय वन्यजीव संस्था (डबल्यूआईआई), देहरादून आदि परन्तु फिर भी इसका उचित समाधान नहीं निकल रहा है।

ऐसे में आवश्यकता है हमें स्वयं से शु्रुआत करने की, खुद की मानसिकता को बदलने की। अगर प्रत्येक व्यक्ति स्वतः एक पेड़ लगाये और उसका संरक्षण करे तथा औरों को भी प्रेरित करे तो यह इस दिशा में एक ऐसी सकारात्मक पहल होगी जिससे आने वाले समय में इस गम्भीर समस्या पर नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है।

आज मनुष्य यह नहीं समझता कि ‘हमारी वजह से इनका जीवन नहीं अपितु इनकी वजह से हमारा जीवन है।’

लेखकः दुर्गेश बहादुर प्रजापति (पत्रकार- ETV Bharat, Ramoji Film City, Hyderabad)