Narendra Giri: जानिए अखाड़ों का संघर्षों और विवादों भरा इतिहास

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के प्रमुख महंत नरेंद्र गिरि की संदिग्ध मौत के मामले में उनके बाघंबरी मठ की ज़मीन से जुड़े विवाद को प्रमुख कारण बताया जा रहा है। अखाड़ों और मठों में ज़मीन का विवाद कोई नया नहीं है, बल्कि लंबे समय से होता आया है। इसके अलावा, अखाड़ों के बीच में भी आपसी विवाद अक्सर होते आए हैं।
साल 1954 के कुंभ में मची भगदड़ के बाद अखाड़ों के बीच टकराव और अव्यवस्था को टालने के लिए अखाड़ा परिषद की स्थापना की गई, जिसमें सभी 13 मान्यता प्राप्त अखाड़ों के दो-दो प्रतिनिधि होते हैं और आपस में समन्वय का काम इसी परिषद के ज़रिए होता है। हालांकि अखाड़ों के बीच विवादों का नाता अखाड़ा परिषद बनने के बाद भी क़ायम रहा लेकिन परिषद बनने के बाद संघर्ष की स्थिति नहीं आने पाई।

जानें अखाड़ों का इतिहास-
ऐसा माना जाता है कि अखाड़ों की शुरुआत आठवीं-नौवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रसार को रोकने के मक़सद से की थी. उन्होंने बद्रीनाथ, द्वारका, रामेश्वरम और जगन्नाथ पुरी में चार धाम की स्थापना की जो बाद में मठ कहलाए. आगे चलकर इन्हीं मठों से संबद्ध 13 अखाड़े बने, जहाँ साधु-संतों को शास्त्र और शस्त्र दोनों की शिक्षा-दीक्षा दी जाती थी। जानकारों का कहना है, इन अखाड़ों को सांगठनिक रूप देने का काम नौवीं दसवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने ही किया जबकि संन्यासियों और उनसे जुड़े अखाड़ों और मठों की परंपरा तो काफ़ी पुरानी है।

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफ़ेसर हेरंब चतुर्वेदी बताते हैं, “सिकंदर के आक्रमण के समय से अखाड़ों की परंपरा की शुरुआत मानी जाती है. सर जदुनाथ सरकार ने अपनी किताब ‘ए हिस्ट्री ऑफ़ दशनामी नागा संन्यासीज़’ में इससे संबंधित कई बातों का उल्लेख किया है। पहले शैव और वैष्णव दो ही अखाड़े थे और दोनों में आधिपत्य और श्रेष्ठता को लेकर प्रतिस्पर्धा हमेशा से रही है। आदि शंकराचार्य के मठों की स्थापना के बाद अखाड़ों का भी एक सांगठनिक ढांचा तैयार हो गया।”

ऐसे होता है अखाड़ों का संचालन
मौजूदा समय में अखाड़ों का संचालन महामंडलेश्वर करते हैं और उनके अधीन कई मंडलेश्वर होते हैं। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के महासचिव महंत हरि गिरि बताते हैं, “एक अखाड़ा आठ खंडों और 52 केंद्रों में विभाजित होता है। अखाड़ों के हिसाब से यह कम ज़्यादा भी हो सकती है। प्रत्येक केंद्र की धार्मिक गतिविधियां एक महंत की देख-रेख में होती हैं।” ”अखाड़े की गतिविधियों को चलाने वाले पाँच सदस्यीय प्रशासनिक अंग का चुनाव प्रत्येक कुंभ में होता है। अखाड़े का मुखिया महामंडलेश्वर होता है और इन्हीं अखाड़ों के प्रतिनिधि अखाड़ा परिषद के सदस्यों का चुनाव करते हैं।”

महंत हरि गिरि बताते हैं कि अखाड़ों में साधुओं का प्रवेश आसान नहीं होता बल्कि इसके लिए उन्हें कड़ी परीक्षा से गुज़रना पड़ता है। साधुओं के प्रवेश देने के लिए अखाड़ों में अलग-अलग व्यवस्था है लेकिन लगभग सभी अखाड़ों में प्रवेश के लिए साधुओं को चार-पाँच साल सेवा करनी पड़ती है। उसके बाद किसी कुंभ में ही उऩ्हें दीक्षा दी जाती है। अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद से जुड़े हिंदू धर्म के ये सभी 13 अखाड़े तीन मतों में बंटे हुए हैं- शैव, वैष्णव या वैरागी और उदासीन। ऐसा माना जाता है इस संप्रदाय में पाँच लाख के क़रीब साधु-संत हैं।

अखाड़ों की छवि और हक़ीक़त –
ऐसा  जाता है कि ये अखाड़े और यहाँ रहने वाले साधु संत आध्यात्मिक कार्यों में लीन रहते हैं लेकिन इतिहास बताता है कि कई बार सशस्त्र संघर्ष में भी इन्होंने हिस्सा लिया है। प्रोफ़ेसर हेरंब चतुर्वेदी बताते हैं कि उन्नीसवीं सदी में कुंभ के दौरान पेशवाओं ने स्नान के विवाद का हल निकाला था और इसीलिए शाही स्नान को पेशवाई भी कहा जाता है।

प्रोफ़ेसर हेरंब चतुर्वेदी के मुताबिक़, “शैव संप्रदाय के लोग तो शुरू से ही शस्त्र धारण करते थे। जदुनाथ सरकार कुरुक्षेत्र में शैव और वैरागियों के बीच हुए संघर्ष का भी ज़िक्र करते हैं, जिसका उल्लेख अकबरनामा में हुआ है और अक़बर ख़ुद उस संघर्ष का प्रत्यक्षदर्शी था। इसकी पुष्टि निज़ामुद्दीन अहमद की पुस्तक तबकाते अकबरी से भी होती है।’ दरअसल, इस काल तक आते-आते अखाड़े औपचारिक रूप से संगठित हो चुके थे। इससे पहले भी कर्नल टॉड ने अपनी पुस्तक ‘एनल्स एंड एंटिक्विटीज़ ऑफ़ राजस्थान’ में भी नागा संन्यासियों का ज़िक्र किया है।

विवादों से रहा है पुराना नाता-
साल 1801 में चित्रकूट में वैष्णव अखाड़ों के प्रतिनिधियों ने आवेदन किया और पेशवा के न्यायालय में फ़ैसला होता है कि कब किसे स्नान का मौक़ा मिले। उसके बाद 1813 में उज्जैन के कुंभ से इसी फ़ैसले के आधार पर दोनों संप्रदायों के संन्यासियों के स्नान का क्रम सुनिश्चित किया गया। शाही स्नान या पेशवाई शब्द भी उसके बाद से ही आया हुआ है।” साल 1954 में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद बनने के बावजूद न सिर्फ़ अखाड़ों के भीतर कई बाद विवाद हुए बल्कि अखाड़ों में आपसी विवाद भी होते रहते हैं, ख़ासकर कुंभ या अर्ध कुंभ के मौक़ों पर। अखाड़ों के पास न सिर्फ़ ज़मीन बल्कि कुछ मंदिरों के प्रबंधन की भी ज़िम्मेदारी रहती है, जहां काफ़ी ज़्यादा चढ़ावा आता है। यही अकूत संपत्ति मठों और अखाड़ों के भीतर विवादों का कारण बनने लगी और संदिग्ध मौतों की ख़बरें भी आए दिन मिलने लगीं। अखाड़ों के पास दान में मिली हज़ारों एकड़ ज़मीन हैं, जिसका उपयोग ये अखाड़े मुनाफ़ा कमाने में करने लगे हैं। यहाँ तक कि अखाड़ों की ज़मीन पर गेस्ट, होटल और अपार्टमेंट तक बना दिए गए हैं और ज़मीन बेच भी दी गई है।

आर्थिक हितों का टकराव-
लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र ने कुछ साल पहले मठों और अखाड़ों में होने वाले संघर्ष पर शोधपरक कहानी की थी। उनका कहना है कि अयोध्या में हर एक अखाड़े का कोई न कोई मंदिर या ज़मीन ज़रूर है और यहाँ शायद ही कोई महंत हो, जिसके ख़िलाफ़ संगीन धाराओं में मुक़दमे न दर्ज हों। यहां तक कि रेप और हत्या तक के मुक़दमे दर्ज थे। योगेश मिश्र कहते हैं, “अखाड़ों में अब किसी तरह की कोई लोकतंत्र नहीं है। हाँ, पहले ज़रूर था लेकिन अब तो महंत जिसे चाहता है, उसे ऊपर उठा देता है। अखाड़े के प्रमुख का चुनाव भी महंत ही करते हैं।” ”दूसरी बात, अखाड़ों में विवाद के कई कारण हैं। पहले विवाद का कारण धन संपत्ति और ज़मीन ही थी। लेकिन अब राजनीति में महंतों और अखाड़ा प्रमुखों की बढ़ती दिलचस्पी ने उनके बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता को बढ़ा दिया है।” ”नए लड़के साधु-संत बन रहे हैं और उनमें भी आगे बढ़ने की वैसी ही चाहत होती है, जैसे अन्य क्षेत्रों में और इसके लिए वो कोई भी रास्ता चुनने में संकोच नहीं करते हैं।”

धन और राजनीतिक प्रतिष्ठा की चाहत के कारण अखाड़ों में महामंडलेश्वरों की संख्या भी बढ़ती गई और मनमाने तरीक़े से महामंडलेश्वर बनाए भी गए। साल 2015 में सचिन दत्ता नाम के एक शराब और रियल एस्टेट व्यवसायी को महामंडलेश्वर बनाने के कारण नरेंद्र गिरि को संतों का कोपभाजन बनना पड़ा था और बाद में उन्हें संतों के दबाव के चलते सचिन दत्ता को दी गई महामंडलेश्वर की पदवी वापस लेनी पड़ी। यही नहीं, महामंडलेश्वर पद देने के बदले में लाखों रुपए लिए जाने के भी आरोप लगे थे, हालांकि किसी भी स्रोत से इन आरोपों की कभी पुष्टि नहीं हो पाई। इन्हीं आरपों के चलते साल 2017 में महामंडलेश्वर बनाने के लिए अखाड़ा परिषद ने नई प्रक्रिया तय की और फ़ैसला हुआ कि बिना समुचित पड़ताल किए किसी को भी महामंडलेश्वर का पद नहीं दिया जाएगा।

नरेंद्र गिरि के अखाड़ा परिषद का अध्यक्ष बनने से पहले यह पद भी विवादों के घेरे में रहा। नरेंद्र गिरि से पहले अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष अयोध्या में हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञानदास थे। साल 2014 में महंत ज्ञान दास की जगह नरेंद्र गिरि को अखाड़ा परिषद का अध्यक्ष चुना गया, लेकिन महंत ज्ञान दास ने नरेंद्र गिरि के निर्वाचन को हाईकोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने इस पर स्टे लगा दिया लेकिन नरेंद्र गिरि को बतौर अध्यक्ष स्वीकार कर लिया गया। साल 2016 में उज्जैन में हुए सिंहस्थ कुंभ में नरेंद्र गिरि को ही अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष के तौर पर मंजूरी मिल गई।

स्रोत: बीबीसी